इतिहास पुरुष बनने की होड़ में हरिवंश…..

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    आजकल देश में इतिहास पुरुष बनने की होड़ चल रही है. कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जो इस बीमारी से अछूता हो.आप इस बीमारी को प्रतिस्पर्द्धा का नाम भी दे सकते हैं .इतिहास पुरुष बनने की आवश्यक अहर्ता है कि आपकी कमर में रीढ़ की हड्डी [मेरुदंड] न हो .और यदि हो भी तो इतनी लचीली हो की पूरी की पूरी झुक सकती हो . हाल ही में देश में राज्य सभा के उप सभापति हरिवंश इतिहास पुरुष बन गए हैं.मै उन्हें बधाई देना चाहता हूँ,क्योंकि उन्होंने अपने पद पर रहते हुए जो कुछ किया है ,वो सब इतिहास में दर्ज हो चुका है .
    केंद्र सरकार द्वारा राज्य सभा में लाये गए किसान विधेयकों को पारित कराना कोई आसान काम नहीं था,लेकिन हरिवंश ने इसे आसान बना दिया. राज्य सभा में सरकार के अल्पमत में होते हुए भी उप सभापति ने इन विधेयकों को ‘ध्वनिमत ‘ से पारित करा दिया .उन्होंने सदन में जो ध्वनि सुनी ,वो ‘तुमुल ध्वनि’ नहीं थी .हरिवंश ने जिसे ध्वनिमत माना वो दरअसल हंगामा था ,जो ठीक उनकी आसंदी के नीचे हो रहा था .इस हंगामे में कागद फाड़े जा रहे थे,माइक तोड़ने की कोशिश की जा रही थी .लेकिन उप सभापति के कान हैं ,वे इस हंगामे को ही ध्वनिमत समझ बैठे .इस उच्च सदन के सदस्य मत विभाजन की मांग करते रहे लेकिन हरिवंश ने किसी की एक न सुनी .और वो ही सब किया जिसके लिए उन्हें दूसरी बार उप सभापति बनाया गया है .
    हरिवंश हमारी अपनी बिरादरी के हैं.हमसे भले ही उम्र में तीन साल बड़े हैं लेकिन उनका अनुभव हमसे तीस गुना ज्यादा है.उनका वैभव भी कम नहीं है और वे हमारी तरह शृद्धानिधि भोगी भी नहीं हैं .वे करोड़पति हैं. वे जिस अखबार के जरिये राजनीति में जगह बना पाए उस अखबार में मेरा धर्मपुत्र भी सम्पादक रह चुका है ,लेकिन ये हरीवंश की निजी जिंदगी में झाँकने का समय नहीं है .उनकी वंशबेल खोज कर अब कुछ हासिल होने वाला नहीं है .उन्होंने पत्रकार बिरादरी के साथ ही राजनीति को जितना नीचे दिखाना था ,दिखा लिया .
    बेशक आप मेरी राय से इत्तफाक नहीं रखते हों ,लेकिन मेरी राय सिर्फ मेरी है.आपकी नहीं.आपकी दृष्टि में हरिवंश ‘युगपरुष’/इतिहास पुरुष हो सकते हैं .लेकिन मेरी नजर में नहीं हैं. मेरी नजर में वे सरकार के इशारे पर नाचने वाली एक कठपुतली भर हैं,इससे ज्यादा नहीं .हरिवंश से पहले देश ने एक दर्जन और उप सभापति देखे हैं ,इनमें भी एक से बढ़कर एक समझदार लोग इस मह्त्वपूर्ण पद पर रह चुके हैं .इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जो हरिवंश की तरह प्रतिभा न होते हुए भी राष्ट्रपति के पद तक भी पहुँच जाते हैं .
    इस पद पर लगातार दूसरी बार बने रहने वाले हरिवंश कोई पहले व्यक्ति नहीं हैं .उनसे पहले भी के रहमान खान,नजमा हेपतुल्ला ,श्यामलाल यादव,गोदे मुराहारी,श्रीमती अल्वा , और श्री एसवी कृष्णमूर्ति राव भी दूसरी बार उप सभापति बने लें जितनी रीढ़ हरिवंश ने झुकाई उतनी शायद ही किसी ने झुकाई हो .दरअसल रीढ़ की हड्डी झुकाना एक कला है और ये कला उन्होंने पत्रकारिता में रहते हुए ही शायद सीख ली थी .खैर किसी की निजी जिंदगी में क्या झांकना.चूंकि हरिवंश नारायण सिंह अब एक संवैधानिक पद पर हैं इसलिए उनके बारे में चर्चा करना आवश्यक है .उन्होंने जो किया उससे सरकार की नाक बच गयी लेकिन उप सभापति की नाक घायल हो गयी .
    राज्य सभा में जिस तरह मर्यादाएं टूटीं उसके लिए हंगामेबाज सदस्य तो दोषी हैं ही,लेकिन उप सभापति भी कम दोषी नहीं हैं. मै भी यदि वहां होता तो शायद वो सब करता जो नियम-कायदे टूटते देख दुसरे सदस्यों ने किया.सदस्यों के पास हंगामा करने के अलावा दूसरा हथियार था भी क्या ?अब भले ही उप सभापति के खिलाफ विपक्ष अविश्वास का प्रस्ताव ले आये लेकिन उसका कोई लाभ नहीं मिलने वाला.क्योंकि जैसे किसान विधेयक पारित करा लिए गए वैसे ही अविश्वास प्रस्ताव को गिरा दिया जाएगा .फिर फिलहाल सरकार को हरिवंश की चिंता भी नहीं है. सरकार हरिवंश को जरूरत पड़ने पर शहीद करने से भी पीछे नहीं हटेगी .आखिर वे कोई संघदक्ष कार्यकर्ता तो हैं नहीं,हैं तो एक कठपुतली ही .
    माननीय उपसभापति जी के बारे में मेरा ये लेख पढ़कर पुराने समाजवादी और नए भाजपाई मित्र नाराज हो सकते हैं,उन्हें इसका अधिकार भी है ,लेकिन मै तो फ़िलहाल अपने अधिकार का इस्तेमाल कर रहा हूँ ,मेरी नजर में हरिवंश एक का पुरुष हैं तो हैं .मेरा नजरिया शायद बदल नहीं सकता .क्योंकि मैंने हरिवंश को अन्य राजनेताओं से कुछ अलग देखा था ,माना था .मेरे साथ पत्रकारिता कर चुके एक माननीय राजयसभा तक तो पहुँच गए लेकिन वे हरिवंश नहीं बन पाए ,ये शायद मेरी ही तरह उनके भी नसीब में नहीं था .केवल झुकने भर से काम नहीं चलता,नसीब भी होना चाहिए .हरिवंश को उनका नसीब आगे कहाँ तक ले जाएगा ये तो पता नहीं लेकिन एक बात तय है कि वे जहाँ भी जायेंगे ,वहां कठपुतली से ज्यादा कुछ नहीं हो पाएंगे .
    देश का दुर्भाग्य ये है कि कांग्रेस की तरह ही भाजपा भी संवैधानिक संस्थाओं के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को अपनी कठपुतली बनाकर अपनी हार को जीत में बदलने का प्रयास लगातार कर रही है .भाजपा ने न न्यायपालिका को छोड़ा और न अन्य किसी संस्था को.केंद्रीय चुनाव आयोग हो या सीबीआई ठीक उसी तरह इस्तेमाल किये जा रहे हैं जैसे अतीत में होते थे .भाजपा अलग चाल,चरित्र और चेहरे के साथ जनता के सामने आयी थी,लेकिन अब उसकी चाल,चरित्र और चेहरे में कांग्रेस ही झलकती है .ये छल लोकतंत्र के लिए अभिशाप है .कहा जाता है कि सत्ता सारे दुर्गुण सीखा देती है .लोकतंत्र में लोगों का यकीन बना रहे इसके लिए सत्तारूढ़ दलों को बहुत कुछ छोड़ने की आदत डालना पड़ेगी अन्यथा कभी इंदिरा गाँधी के रूप में तो कभी नरेंद्र मोदी के रूप में देश कि हठी नेतृत्व के साथ रहने की आदत डालना ही पड़ेगी .
    राज्य सभा के उप सभापति जेडीयू के अंग हैं,जेडीयू बिहार में भाजपा के साथ सत्ता में है और आगे भी रहना चाहती है और शायद इसीलिए हरिवंश को भी शतुर्मुर्गी मुद्रा अपनाने के लिए विवश होना पड़ा .हरिवंश विवश थे या उन्होंने अन्य किसी कारणों से अपनी भूमिका को सवालों के घेरे में लाकर खड़ा किया है ,ये वे ही जानते होंगे .देश तो सिर्फ इतना जानता है कि उन्होंने देश के उच्च सदन की गरिमा को धूमिल किया है .उनकी जगह कोई दूसरा भी ये सब करता ,तो भी उसके लिए भी यही सब लिखा जाता ..

    (@ राकेश अचल ,)

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