चम्बल में प्रवासी पक्षीयो की दस्तक: सर्दियों के मौसम में हज़ारों किलोमीटर का सफर तय कर चम्बल के तट पहुँचते है विदेशी पक्षी..

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सर्दियों के मौसम में सात समंदर पार कर आने वाले आकाशीय पक्षियों का डेरा चंबल नदी किनारे बना हुआ है। लगभग एक महीने की लंबी यात्रा कर यहां पहुँचे साइबेरियन पक्षियों के कारण चंबल नदी का नजारा बदल गया है और इन्हें देखने सैलानियों का जमाबड़ा भी चम्बल पर अब देखा जा सकता है। सर्दियों में मौसम में चंबल नदी किनारे आपको कई प्रजातियो देखने को मिल जाती है। करीब तीन महीने साइबेरियन पक्षी यहां प्रवास करते है और फिर एक लंबी उड़ान के बाद वापस अपने देश लौट जाते है।
– चंबल नदी में शीतकालीन प्रवास पर विदेशी पक्षियों ने आमद दे दी है। मप्र और राजस्थान की सीमा पर स्थित चम्बल राजघाट पुल के पास चंबल नदी में साइबेरियन पक्षियों का झुंड दिखाई दिया । इसके अलावा
कई प्रजाति की बत्तख रूस, मंगोलिया और तिब्बत से आए हैं।
इनके अलावा करीब एक सैकड़ा पक्षियों की अलग-अलग प्रजातियों ने चंबल के संगम पर कॉलोनी बसाईं हैं। हर वर्ष यहां चम्बल तट पर दिसम्बर माह में विदेशी पक्षियों की आमद होती है और तीन माह प्रवास के बाद फरवरी माह से स्वदेश लौट जाते है।

ये प्रजातियां आने लगी हैं चंबल में :
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ब्लैक नैक्ड स्टोर्क, वूली नेक्ड स्टोर्क, पेंटेड स्टोर्क, एशियन ओपनबिल, स्टोर्क, जेकाना, गरगेनी, ब्लैक स्टोर्क, रेड हेडेड, बंटिंग, ब्लैक हेडेड, इंडियन स्कीमर सहित कई प्रजातियों के पक्षी आने लगे हैं।

इनकी खूबी…
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यूरोप, अफ्रीका और एशिया के कई देशों से आए स्पूनबिल पक्षियों से चंबल सेंक्चुरी आबाद हो उठी है। चम्मच जैसी चोंच वाले पक्षी स्पूनबिल को चंबल नदी का स्वच्छ पानी और पर्यावरण रास आ गया है। यहां इसे भारी मात्रा में अपना शिकार और भोजन उपलब्ध है। पतली काली टांगों वाली स्पूनबिल तीन, चार साल से चम्बल में आकर पर्यटकों को लुभा रही है। चंबल नदी का साफ पानी, नदी की मछली, जलीय कीडे़ और छोटे मेढक स्पूनबिल का भोजन होते हैं।

चंबल में अवैध उत्खनन की वजह से घड़ियाल कर रहे चम्बल नदी से पलायन….

चंबल घड़ियालों के लिए सबसे महफूज जगह मानी जाती है लेकिन अब घड़ियालों का चंबल नदी से मोह भंग हो रहा है. रिसर्च में इस बात की पुष्टी हुई है कि श्योपुर की पार्वती नदी और कूनो नदी में घड़ियालों ने पलायन किया है, घड़ियालों का चंबल नदी से पलायन करने के पीछे कई वजह हैं, इनमें रेत तेजी हो रहा उत्खनन और उनके इलाके में कृत्रिम शोर का बढ़ना है। और इस बात की पुष्टि चंबल अभ्यारण में चल रहे शोध कार्य से हुई है, इस शोध से पता चला है कि श्योपुर की पार्वती नदी और कूनो नदी में घड़ियाल ने पलायन किया है। वन अधिकारी भी इस बात को मान रहे हैं कि कूनो नदी घड़ियालों के लिए चंबल से ज्यादा सुरक्षित है, जिसके बाद अब वह राज्य स्तर से श्योपुर की कूनो नदी में ईको सेंटर देवरी से 25 घायलों को छोड़ने के निर्देश मिले हैं।
इस साल 2020 के नेस्टिंग सीजन में उन्होंने इस मादा घड़ियाल की श्योपुर की कूनो नदी में जाने की पुष्टि की। कूनो वन्य अभ्यारण के अधिकारियों को एनसीवीटी की रिसर्च में पता चला है कि कोई मादा घड़ियाल कूनो नदी में आई है. वन विभाग ने उसे कूनो पालपुर में ट्रेस किया तो उसकी लोकेशन चंबल नदी से 15 किलोमीटर के भीतर कूनो नदी के किनारे पर मिली, जहां उसने अंडे भी दिए थे, और इनसे बच्चे भी निकले. किसी घड़ियाल के यहां आकर बसने का पहला मामला है. कूनो नदी चंबल से अधिक सुरक्षित है.

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